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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 85
पार्थिवे वायुमारोप्य लकारेण समन्वितम्। ध्यायंश्चतुर्भुजाकारं चतुर्वक्त्रं हिरण्मयम् ॥
पृथ्वी तत्त्व में बायु को आरोपित करते हुए 'ल' कार को उसमें संयुक्त करके उस स्थान में स्वर्ण के समान रंग से युक्त चार भुजाओं एवं चतुर्मुख ब्रह्मा जी का ध्यान करना चाहिए।
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