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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 82
वायुना सह चित्तं च प्रविशेच्च महापथम्। यस्य चित्तं स्वपवनं सुषुम्नां प्रविशेदिह ॥
तत्पश्चात् वायु के सहित चित्त को महापथ में अग्रसर करना चाहिए। जिस योगी का चित्त वायु के सहित 'सुषुम्ना' नाड़ी में प्रविष्ट हो जाता है,
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