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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 81
वायुः परिचितो यत्नादग्निना सह कुण्डलीम्। भावयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥
उस (अवस्था) के लिए प्रयत्नपूर्वक वायु से प्रदीत अग्नि सहित कुण्डलिनी को साधना के द्वारा जाग्रत् करके भावनापूर्वक सुषुम्ना में अवरोध रहित प्रवेश कराना चाहिए।
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