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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 73
वाक्सिद्धिः कामरूपत्वमदृश्यकरणी तथा। मलमूत्रप्रलेपेन लोहादेः स्वर्णता भवेत् ॥
वाणी की सिद्धि, जब चाहे जैसा रूप ग्रहण कर लेना, अदृश्य हो जाना, उसके मल-मूत्र के स्पर्श से लोहे का स्वर्ण में परिवर्तन हो जाना,
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