यथा वा चित्तसामर्थ्य जायते योगिनो ध्रुवम्।
दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः क्षणाहूरागमस्तथा ॥
इस प्रकार के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे योगी की चित्त-शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे ही उसको दूर-श्रवण, दूर-दर्शन, क्षण भर में सुदूर क्षेत्र से आ जाना,
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