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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 70
जिह्वया यद्रसं ह्यत्ति तत्तदात्मेति भावयेत्। त्वचा यद्यत्स्पृशेद्योगी तत्तदात्मेति भावयेत् ॥
जिह्ना के माध्यम से जो भी कुछ रस ग्रहण करे, उसको भी आत्मरूप जाने। त्वचा से जो कुछ भी स्पर्श हो, उसमें भी अपनी आत्मा की ही भावना करे।
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