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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 66
पूर्व यः कथितोऽभ्यासश्चतुर्थांशं परिग्रहेत्। दिवा वा यदि वा सायं याममात्रं समभ्यसेत् ॥
पूर्व में जितना अभ्यास योगी करता था, उसका चतुर्थ भाग ही अब करे। दिन अथवा रात्रि में मात्र एक प्रहर ही अभ्यास करना चाहिए।
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