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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 65
अन्योन्यस्याविरोधेन एकता घटते यदा। घटावस्थेति सा प्रोक्ता तच्चिह्नानि ब्रवीम्यहम् ॥
जिस अभ्यास में प्राण, अपान, मन, बुद्धि, जीव तथा परमात्मा में जो पारस्परिक निर्विरोध एकता स्थापित होती है, उसे घटावस्था कहा गया है। उसके चिह्नों का वर्णन आगे के श्लोकों में करते हैं।
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