म दर्शयेच्च सामर्थ्य दर्शनं वीर्यवत्तरम्।
स्वल्पं वा बहुधा दुःखं योगी न व्यथते तदा ॥
(परन्तु) योगी को इस प्रकार की शक्ति एवं सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, वरन् स्वयं ही देखकर अपना उत्साहवर्द्धन करना चाहिए। तब थोड़ा या बहुत कष्ट भी योगी को पीड़ा नहीं पहुँचा सकता।
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