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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 54
पद्मासनस्थ एवासौ भूमिमुत्सृज्य वर्तते। अतिमानुषचेष्टादि तथा सामर्थ्यमुद्भवेत् ॥
प‌द्मासन पर बैठा हुआ योगी अत्यन्त अभ्यास के कारण भूमि से ऊपर ही उठा रहता है। वह इस तरह से और भी अतिमानुषी चेष्टाएँ निरन्तर करने लगता है।
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