कृशत्वं च शरीरस्य तदा जायेत निश्चितम्।
योगविघ्नकराहारं वर्जयेद्योगवित्तमः ॥
शरीर भी निश्चित रूप से कृश हो जाता है। ऐसे समय में योग में बाधा पहुँचाने वाले आहार का परित्याग कर देना चाहिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
योगतत्त्व के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
योगतत्त्व के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।