एवं मासत्रयाभ्यासान्नाडीशुद्धिस्ततो भवेत्।
यदा तु नाडीशुद्धिः स्यात्तदा चिह्नानि बाह्यतः ॥
इस तरह से तीन मास तक अभ्यास करने से नाड़ी शोधन हो जाता है। ऐसी शुद्धि होने से उस (श्रेष्ठ साधक) के चिह्न भी योगी की देह में दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
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