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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 3
तमाराध्य जगन्नाथं प्रणिपत्य पितामहः । पप्रच्छ योगतत्त्वं मे ब्रूहि चाष्टाङ्गसंयुतम् ॥
पितामह ब्रह्माजी ने उन जगत् के स्वामी (भगवान् विष्णु) की आराधना एवं प्रणाम करके, कहा - हे जगन्नाथ! आप अष्टाङ्ग युक्त योग का उपदेश मुझे प्रदान करें।
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