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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 23
लययोगश्चित्तलयः कोटिशः परिकीर्तितः । गच्छंस्तिष्ठ-स्वपभुञ्चध्यायेन्निष्कलमीश्वरम् ॥
चित्त का लय ही लययोग है, वह करोड़ों तरह का कहा गया है, चलते, बैठते, रुकते, शयन करते, भोजन करते, कलारहित परमात्मा का निरन्तर चिन्तन करता रहे।
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