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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 141
घटमध्ये यथा दीपो निवातं कुम्भकं विदुः। निषिद्धैर्नवभिद्वरैिर्निर्जने निरुपद्रवे ॥ निश्चितं त्वात्ममात्रेणावशिष्टं योगसेवयेत्युपनिषत् ॥
जिस तरह वायुरहित घड़े के मध्य में (स्थिर लौ वाला) दीपक रखा होता है, उसी तरह से कुम्भक को जानना चाहिए। इस योग साधना में नौ द्वारों के अवरुद्ध किये जाने पर सुनसान एवं निरुपद्रव स्थान में आत्मतत्त्व ही मात्र शेष रहता है। ऐसा ही यह योगतत्त्व उपनिषद् है।
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