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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 133
भ्रमन्तो योनिजन्मानि श्रुत्वा लोकान्समश्नुते। त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्तिस्त्रः संध्यास्त्रयः स्वराः ।।
जिसमें प्राणी नाना प्रकार की योनियों में सतत गमनागमन करता रहता है। तीन ही लोक हैं, तीन ही वेद कहे गये हैं, तीन संध्यायें हैं, तीन स्वर हैं,
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