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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 132
यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः स पुनः पिता। एवं संसारचक्रेण कूपचक्रे घटा इवं ॥
जो पिता होता है, वह पुत्र बन जाता है तथा जो पुत्र होता है, वह पिता के रूप में जन्म ले लेता है। इस तरह से यह संसार चक्र, कूप-चक्र (पानी खींचने की रहट) के सदृश है।
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