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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 130
तत्त्वमार्गे यथा दीपो दृश्यते पुरुषोत्तमः। यः स्तनः पूर्वपीतस्तं निष्पीड्य मुदमश्रुते ॥
तत्त्वमार्ग पर गमन करने वाले को वे पुरुषोत्तम दीपक की भाँति दृष्टिगोचर होते हैं। (यह जीवन विभिन्न योनियों में घूमता हुआ मानव योनि में आता है) तब वह जिस स्तन को पीता है, दूसरी अवस्था में वैसे ही स्तन को दबाकर आनन्दानुभूति करता है।
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