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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 127
अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन्दिने दिने। वज्रोलीमभ्यसेत्रित्यममरोलीति कथ्यते ॥
जो (योगी) 'अमरी' को प्रतिदिन पीता है एवं घ्राणेन्द्रिय के द्वारा उसका नस्य करता (सूँघता) है तथा वज्रोली का अभ्यास करता है, तो उसे अमरोली का साधक कहा जाता है।
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