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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 122
नित्यमभ्यासयुक्तस्य जाठराग्ग्रिविवर्धनी। आहारो बहुलस्तस्य संपाद्यः साधकस्य च ॥
इस विपरीतकरणी मुद्रा का नित्य अभ्यास करने से साधक की जठराग्नि बढ़ जाती है। इस कारण साधक अधिक आहार (भोजन) को पचा सकने में समर्थ हो जाता है।
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