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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 121
गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नात्र संशयः। करणी विपरीताख्या सर्वव्याधिविनाशिनी ॥
यह संशयरहित योग सिद्ध कराने वाला है। अब विपरीतकरणी मुद्रा के सन्दर्भ में बतलाते हैं। इसे समस्त व्याधियों का विनाश करने वाली कहा गया है।
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