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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 118
जालंधराख्यो ऽयं मृत्युमातङ्गकेसरी। बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥
जो मृत्यु रूपी हाथी के लिए सिंह के समान होता है। जिस बन्ध से प्राण सुषुम्ना में उठ जाता है।
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