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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 117
भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा मुद्रा भवति खेचरी। कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेदृढया धिया ॥
दोनों भृकुटियों के मध्य में दृष्टि को स्थिर करना खेचरी मुद्रा है। कण्ठ को संकुचित करके (ठोड़ी को) दृढ़तापूर्वक वक्ष पर स्थापित करना ही जालन्धर बन्ध कहलाता है।
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