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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 116
अयमेव महावेधः सिद्धैरभ्यस्यते ऽनिशम् । अन्तः कपालकुहरे जिह्वां व्यावृत्य धारयेत् ॥
सिद्ध योगीजन इस (ऊपर वर्णित) महावेध का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। जिह्वा को लौटाकर, अन्तः कपाल-कुहर में लगाकर
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