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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 115
वायुना गतिमावृत्य निभृतं कण्ठमुद्रया। पुटद्वयं समाक्रम्य वायुः स्फुरति सत्वरम् ॥
एकाग्र होकर कण्ठ को मुद्रा द्वारा वायु की गति को आवृत करके दोनों नासिका रन्ध्रों को संकुचित करने से तत्परतापूर्वक वायु भर जाती है।
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