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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 114
अयमेव महाबन्ध उभयत्रैवमभ्यसेत्। महाबन्धस्थितो योगी कृत्वा पूरकमेकधीः ॥
यह ही महाबन्ध कहलाता है। इस बन्ध का दोनों ही प्रकार से अभ्यास किया जाता है। महाबन्ध की क्रिया में सतत संलग्न रहने वाले योगी को
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