मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 109
मनुष्यो वापि यक्षो वा स्वेच्छयापि क्षणाद्भवेत् । सिंहो व्याघ्नो गजो वाश्वः स्वेच्छया बहुतामियात् ॥
योगी स्वेच्छा से मनुष्य अथवा यक्ष का रूप भी क्षणभर में धारण कर सकता है। वह सिंह, हाथी, घोड़ा आदि अनेक रूपों को स्वेच्छापूर्वक धारण कर सकने में समर्थ होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
योगतत्त्व के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

योगतत्त्व के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें