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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 107
परब्रह्मणि लीयेत न तस्योत्क्रान्तिरिष्यते। अथ नो चेत्समुत्स्त्रष्टं स्वशरीरं प्रियं यदि ॥
इस प्रकार से योगी अपने आपको परब्रह्म में विलीन कर लेता है, उसे पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता; किन्तु यदि उसको शरीर प्रिय लगता है, तो वह स्वयं ही अपने शरीर में स्थित होकर
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