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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 106
समाधिः समतावस्था जीवात्मपरमात्मनोः। यदि स्वदेहमुत्त्रष्टमिच्छा चेदुत्सृजेत्स्वयम् ॥
समाधि में जीवात्मा एवं परमात्मा की समान अवस्था हो जाती है। उसमें यदि अपना शरीर छोड़ने की इच्छा हो, तो उसका परित्याग भी किया जा सकता है।
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