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योगतत्त्व • अध्याय 1 • श्लोक 102
एवं च धारणाः पञ्च कुर्याद्योगी विचक्षणः । ततो दृढशरीरः स्यान्मृत्युस्तस्य न विद्यते ॥
इस प्रकार विशेष लक्षणों से संयुक्त योगी को पाँच तरह की धारणा करनी चाहिए। इस धारणा से उस योगी का शरीर अत्यन्त दृढ़ हो जाता है तथा उसे मृत्यु का भय भी व्याप्त नहीं होता।
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