हे राजादि सभ्यजनो ! (वसवः) चौबीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य्य से विद्या पढ़नेवाले विद्वानो ! आप लोग जैसे (त्रयोदशाक्षरेण) तेरह अक्षरों की आसुरी अनुष्टुप् वेदस्थ छन्द से जिस (त्रयोदशम्) दश प्राण, जीव, महत्तत्त्व और अव्यक्त कारणरूप (स्तोमम्) प्रशंसा के योग्य पदार्थ समूह को (उदजयन्) श्रेष्ठता से जानें, वैसे (तम्) उसको मैं भी (उज्जेषम्) उत्तमता से जानूँ। हे बल, पराक्रम और पुरुषार्थयुक्त (रुद्राः) चवालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य्य से विद्या पढ़नेहारे विद्वानो ! जैसे आप (चतुर्दशाक्षरेण) चौदह अक्षरों की साम्नी उष्णिक् छन्द से (चतुर्दशम्) दश इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकाररूप (स्तोमम्) प्रशंसा के योग्य पदार्थविद्या को (उदजयन्) प्रशंसित करें, वैसे मैं भी (तम्) उसको (उज्जेषम्) प्रशंसित करूँ। हे (आदित्याः) अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य से समस्त विद्याओं को ग्रहण करनेहारे पूर्ण विद्या से शरीर और आत्मा के समस्त बल से युक्त सूर्य्य के समान प्रकाशमान विद्वानो ! आप लोग जैसे (पञ्चदशाक्षरेण) पन्द्रह अक्षरों की आसुरी गायत्री से (पञ्चदशम्) चार वेद, चार उपवेद अर्थात् आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद (गानविद्या) तथा अर्थवेद (शिल्पशास्त्र) छः अङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) मिल के चौदह, उनका संख्यापूरक पन्द्रहवाँ क्रियाकुशलतारूप (स्तोमम्) स्तुति के योग्य को (उदजयन्) अच्छे प्रकार से जानें, वैसे मैं भी (तम्) उसको (उज्जेषम्) अच्छे प्रकार से जानूँ। हे (अदितिः) आत्मारूप से नाशरहित सभाध्यक्ष राजा की विदुषी स्त्री अखण्डित ऐश्वर्ययुक्त ! आप जैसे (षोडशाक्षरेण) सोलह अक्षर की साम्नी अनुष्टुप् से (षोडशम्) प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान इन सोलह पदार्थों की व्याख्यायुक्त (स्तोमम्) प्रशंसा के योग्य को (उदजयत्) उत्तमता से जानें, वैसे मैं भी (तम्) उसको (उज्जेषम्) उत्तमता से जानूँ। हे नरेश ! (प्रजापतिः) प्रजा के रक्षक आप जैसे (सप्तदशाक्षरेण) सत्रह अक्षरों की निचृदार्षी छन्द से (सप्तदशम्) चार वर्ण, चार आश्रम, सुनना, विचारना, ध्यान करना, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त का रक्षण, रक्षित का बढ़ाना, बढ़े हुए को अच्छे मार्ग सबके उपकार में खर्च करना, यह चार प्रकार का पुरुषार्थ और मोक्ष के अनुष्ठानरूप (स्तोमम्) अच्छे प्रकार प्रशंसनीय को उत्तमता से जानें, वैसे मैं भी उसको (उज्जेषम्) उत्तमता से जानूँ
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