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यजुर्वेद • अध्याय 9 • श्लोक 20
आ॒पये॒ स्वाहा॑ स्वा॒पये॒ स्वा॒हा॑ऽपि॒जाय॒ स्वाहा॒ क्रत॑वे॒ स्वाहा॒ वस॑वे॒ स्वा॒हा॑ह॒र्पत॑ये॒ स्वाहाह्ने॑ मु॒ग्धाय॒ स्वाहा॑ मु॒ग्धाय॑ वैनꣳशि॒नाय॒ स्वाहा॑ विन॒ꣳशिन॑ऽआन्त्याय॒नाय॒ स्वाहाऽनन्त्या॑य भौव॒नाय॒ स्वाहा॒ भुव॑नस्य॒ पत॑ये॒ स्वाहाऽधि॑पतये॒ स्वाहा॑ ॥
हे विद्वानो ! तुम लोग जैसे मुझको (आपये) सम्पूर्ण विद्या की प्राप्ति के लिये (स्वाहा) सत्य क्रिया (स्वापये) सुखों की अच्छी प्राप्ति के वास्ते (स्वाहा) धर्मयुक्त क्रिया (क्रतवे) बुद्धि बढ़ाने के लिये (स्वाहा) पढ़ाने की प्रवृत्ति करानेहारी क्रिया (अपिजाय) निश्चय करके प्रकट होने के लिये (स्वाहा) पुरुषार्थ क्रिया (वसवे) विद्यानिवास के लिये (स्वाहा) सत्य वाणी (अहर्पतये) पुरुषार्थपूर्वक गणितविद्या से दिन पालने के लिये (स्वाहा) कालगति को जाननेहारी वाणी (मुग्धाय) मोहप्राप्ति के निमित्त (अह्ने) दिन होने के लिये (स्वाहा) विज्ञानयुक्त वाणी (वैनंशिनाय) नष्टस्वभावयुक्त कर्मों में रहनेहारे (मुग्धाय) मूर्ख के लिये (स्वाहा) चितानेवाली वाणी (आन्त्यायनाय) नीच प्राप्तिवाले (विनंशिने) नष्टस्वभावयुक्त पुरुष के लिये (स्वाहा) नष्ट-भ्रष्ट कर्मों का निवारण करनेहारी वाणी (आन्त्याय) अधोगति में होनेवाले (भौवनाय) लोगों के बीच समर्थ पुरुष के लिये (स्वाहा) पदार्थों की जाननेहारी वाणी (भुवनस्य पतये) संसार के स्वामी ईश्वर के लिये (स्वाहा) योगविद्या को प्रकट करनेहारी बुद्धि और (अधिपतये) सब अधिष्ठाताओं के ऊपर रहनेवाले पुरुष के लिये (स्वाहा) सब व्यवहारों को जनानेहारी वाणी (गम्यात्) प्राप्त होवे, वैसा प्रयत्न आलस्य छोड़ के किया करो
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