जिन विद्वानों ने यज्ञ-विधान से (चमसेषु) मेघों में सुगन्धित आदि वस्तुओं को (उन्नीतः) ऊँचा पहुँचाया (असुः) अपना प्राण (उद्यतः) अच्छे यत्न से लगाया (रुद्रः) जीव को पवित्र कर (हूयमानः) स्वीकार किया, (नृचक्षाः) मनुष्यों को देखनेवाले का (प्रतिख्यातः) जिन्होंने वादानुवाद किया (वातः) बाहर के वायु अर्थात् मैदान के कठिन वायु के सह वायु शुद्ध किये फल (भक्ष्यमाणः) कुछ भोजन करने योग्य पदार्थ (भक्षः) खाइये (नाराशंसाः) प्रशंसाकर मनुष्यों के उपदेशक (विश्वेदेवाः) सब विद्वान् (पितरः) उन सब के उपकारकों को ज्ञानी समझने चाहियें
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