हे (पत्मन्) धर्म्म में न चित्त देनेवाले पते ! (व्रेशीनाम्) जलों के समान निर्मल विद्या और सुशीलता में व्याप्त जो पराई पत्नियाँ हैं, उनमें व्यभिचार से वर्त्तमान (त्वा) तुम को मैं वहाँ से (आधूनोमि) अच्छे प्रकार डिगाती हूँ। हे (पत्मन्) अधर्म्म में चित्त देनेवाले पते ! (कुकूननानाम्) निरन्तर शब्दविद्या से नभ्रीभाव को प्राप्त हो रही हुई औरों की पत्नियों के समीप मूर्खपन से जानेवाले (त्वा) तुझ को मैं (आ) (धूनोमि) वहाँ से अच्छे प्रकार छुड़ाती हूँ। हे (पत्मन्) कुचाल में चित्त देनेवाले पते ! (भन्दनानाम्) कल्याण का आचरण करती हुई पर पत्नियों के समीप अधर्म से जानेवाले (त्वा) तुझ को वहाँ से मैं (आ) अच्छे प्रकार (धूनोमि) पृथक् करती हूँ। हे (पत्मन्) चञ्चल चित्तवाले पते ! (मदिन्तमानाम्) अत्यन्त आनन्दित परपत्नियों के समीप उनको दुःख देते हुए (त्वा) तुम को मैं वहाँ से (आ) वार-वार (धूनोमि) कंपाती हूँ। हे (पत्मन्) कठोरचित्त पते ! (मधुन्तमानाम्) अतिशय करके मीठी-मीठी बोलनेवाली परपत्नियों के निकट कुचाल से जाते हुए (त्वा) तुम को मैं (आ) अच्छे प्रकार (धूनोमि) हटाती हूँ। हे (पत्मन्) अविद्या में रमण करनेवाले ! (अह्नः) दिन के (रूपे) रूप में अर्थात् (सूर्यस्य) सूर्य की फैली हुई किरणों के समय में घर में सङ्गति की चाह करते हुए (शुक्रम्) शुद्ध वीर्यवाले (त्वा) तुम को (शुक्रे) वीर्य के हेतु (आ) भले प्रकार (धूनोमि) छुड़ाती हूँ
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