हे (गातुविदः) अपने गुण, कर्म और स्वभाव से पृथिवी के आने-जाने को जानने (देवाः) तथा सत्य और असत्य के अत्यन्त प्रशंसा के साथ प्रचार करनेवाले विद्वान् लोगो ! तुम (गातुम्) भूगर्भविद्यायुक्त भूगोल को (वित्त्वा) जान कर (गातुम्) पृथिवी राज्य आदि उत्तम कामों के उपकार को (इत) प्राप्त हूजिये। हे (मनसस्पते) इन्द्रियों के रोकनेहारे (देव) श्रेष्ठ विद्याबोधसम्पन्न विद्वानो ! तुममें से प्रत्येक विद्वान् गृहस्थ (स्वाहा) धर्म बढ़ानेवाली क्रिया से (इमम्) इस गृहाश्रम रूप (यज्ञम्) सब सुख पहुँचानेवाले यज्ञ को (वाते) विशेष जानने योग्य व्यवहारों में (धाः) धारण करो
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