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यजुर्वेद • अध्याय 7 • श्लोक 30
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ मध॑वे त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ माध॑वाय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि शु॒क्राय॑ त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शुच॑ये त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ नभ॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि नभ॒स्या᳖य त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसी॒षे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽस्यू॒र्जे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सह॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि सह॒स्या᳖य त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ तप॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि तप॒स्या᳖य त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽस्यꣳहसस्प॒तये॑ त्वा ॥
हे राजन् ! जिस से आप (उपयामगृहीतः) अच्छे-अच्छे राज्य प्रबन्ध के नियमों से स्वीकार किये हुए (असि) हैं, इससे (त्वा) आपको (मधवे) चैत्र मास की सभा के लिये अर्थात् चैत्र मास प्रसिद्ध सुख करानेवाले व्यवहार की रक्षा के लिये हम लोग स्वीकार करते हैं। सभापति कहता है कि हे सभासदो तथा प्रजा वा सेनाजनो ! तुममें से एक-एक (उपयामगृहीतः) अच्छे-अच्छे नियमों से स्वीकार किया हुआ (असि) है, इसलिये तुम को चैत्र मास के सुख के लिये स्वीकार करता हूँ। इसी प्रकार बारहों महीनों के यथोक्त सुख के लिये राजा, राजसभासद्, प्रजाजन और सेनाजन परस्पर एक-दूसरे को स्वीकार करते रहें
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