यस्तु सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति। स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति ॥
हे मनुष्यो ! (यः) जो विद्वान् जन (आत्मन्) परमात्मा के भीतर (एव) ही (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणी-अप्राणियों को (अनुपश्यति) विद्या, धर्म और योगाभ्यास करने के पश्चात् ध्यानदृष्टि से देखता है (तु) और जो (सर्वभूतेषु) सब प्रकृत्यादि पदार्थों में (आत्मानम्) आत्मा को (च) भी देखता है, वह विद्वान् (ततः) तिस पीछे (न) नहीं (वि चिकित्सति) संशय को प्राप्त होता, ऐसा तुम जानो ।
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