हे (वनस्पते) प्रकाशनीय विद्याओं का प्रचार करनेवाले विद्वान् मनुष्य ! तू जो (आङ्गिरसि) अग्नि आदि पदार्थों से सिद्ध की हुई (ऊर्णम्रदाः) आच्छादन का प्रकाश वा (ऊर्क्) पराक्रम तथा अन्नादि को करनेवाली शिल्पविद्या (असि) है अथवा जो (ऊर्जम्) पराक्रम वा अन्न आदि को धारण करती (असि) है, जो (सोमस्य) उत्पन्न पदार्थ समूह का (नीविः) संवरण करनेवाली (असि) है, जो (विष्णोः) शिल्पविद्या में व्यापक बुद्धि (यजमानस्य) शिल्पक्रिया को जाननेवाले (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्ययुक्त मनुष्य के (शर्म) सुख का (योनिः) निमित्त (असि) है, जो (अस्य) इस (उदृचः) ऋचाओं के प्रत्यक्ष करनेवाले (यज्ञस्य) शिल्पक्रिया-साध्य यज्ञ की (शर्म) सुख करानेवाली (असि) है, उसको (मयि) शिल्पविद्या को जानने की इच्छा करनेवाले मुझ में (आ धेहि) अच्छे प्रकार धारण कर (सुसस्याः) उत्तम-उत्तम धान्य उत्पन्न करने वा (कृषीः) खेती वा खेंचनेवाली क्रियाओं को (कृधि) सिद्ध कर, (ऊर्ध्वः) ऊपर स्थित होनेवाले (मा) मुझ को (उच्छ्रयस्व) उत्तम धान्यवाली खेती का सेवन कराओ और (अंहसः) पाप वा दुःखों से (पाहि) रक्षा कर, जो विमान आदि यानों और यज्ञ में (वनस्पते) वृक्ष की शाखा ऊँची स्थापन की जाती है, उस को भी (उच्छ्रयस्व) उपयोग में लाओ
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