पय॑सो॒ रेत॒ऽआभृ॑तं॒ तस्य॒ दोह॑मशीम॒ह्युत्त॑रामुत्तरा॒ समा॑म्। त्विषः॑ सं॒वृक् क्रत्वे॒ दक्ष॑स्य ते सुषु॒म्णस्य॑ ते सुषुम्णाग्निहु॒तः। इन्द्र॑पीतस्य प्र॒जाप॑तिभक्षितस्य॒ मधु॑मत॒ऽ उप॑हूत॒ऽ उप॑हूतस्य भक्षयामि ॥
हे (सुषुम्ण) शोभन सुखयुक्त जन ! जैसे आपने जिस (पयसः) जल वा दूध के (रेतः) पराक्रम को (आभृतम्) पुष्ट वा धारण किया (तस्य) उसकी (दोहम्) पूर्णता तथा (उत्तरामुत्तराम्) उत्तर-उत्तर (समाम्) समय को (अशीमहि) प्राप्त होवें। उस (ते) आपकी (क्रत्वे) बुद्धि के लिये (त्विषः) प्रकाशित (दक्षस्य) बल के और (ते) आपकी पुष्टि वा धारण को प्राप्त होवें (सुषुम्णस्य) सुन्दर सुख देनेवाले (इन्द्रपीतस्य) सूर्य्य वा जीव ने ग्रहण किये (प्रजापतिभक्षितस्य) प्रजारक्षक ईश्वर ने सेवन वा जीव ने भोजन किये (उपहूतस्य) समीप लाये हुए (मधुमतः) दूध वा जल के दोषों को (संवृक्) सम्यक् अलग करनेवाला (उपहूतः) समीप बुलाया गया और (अग्निहुतः) अग्नि में होम करनेवाला मैं (भक्षयामि) भोजन वा सेवन करूँ ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
यजुर्वेद के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
यजुर्वेद के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।