हे (अश्विना) सुशिक्षित स्त्री-पुरुष ! तुम (अहः) प्रतिदिन (दिवाभिः) दिन-रात वर्त्तमान (ऊतिभिः) रक्षादि क्रियाओं से (तन्त्रायिणे) शिल्पविद्या के शास्त्रों को जानने वा प्राप्त होने के लिये (हार्द्वानम्) हृदय को प्राप्त हुए ज्ञानसम्बन्धी (घर्मम्) यज्ञ की (पातम्) रक्षा करो और (द्यावापृथिवीभ्याम्) सूर्य और आकाश के सम्बन्ध से शिल्पशास्त्रज्ञ पुरुष के लिये (नमः) अन्न को देओ।
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