हे (अश्विना) अध्यापक उपदेशक लोगो ! तुम (इह) इस जगत् में (स्वाहाकृतस्य) सत्यक्रिया से सिद्ध हुए (घर्मस्य, मधोः) मधुरादि गुणयुक्त यज्ञ के अवशिष्ट भाग को (पिबतम्) पिओ, वैसे यह (दक्षिणसत्) वेदी से दक्षिण दिशा में बैठनेवाला आचार्य्य (विश्वाः) सब (आशाः) दिशाओं तथा (विश्वान्) समस्त (देवान्) उत्तम गुणों वा विद्वानों का (अयाट्) सङ्ग वा सेवन पूजन करे।
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