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यजुर्वेद • अध्याय 35 • श्लोक 13
अ॒न॒ड्वाह॑म॒न्वार॑भामहे॒ सौर॑भेयꣳ स्व॒स्तये॑। स न॒ऽइन्द्र॑ऽइव दे॒वेभ्यो॒ वह्निः॑ स॒न्तर॑णो भव ॥
हे विद्वन् ! जो (वह्निः) शीघ्र पहुँचानेवाला अग्नि (नः, देवेभ्यः) हम विद्वानों के लिये (सन्तरणः) सम्यक् मार्गों से पार करनेवाला होता है, उस (सौरभेयम्) सुरभि गौ के सन्तान (अनड्वाहम्) गाड़ी आदि को खींचनेवाले बैल के तुल्य वर्त्तमान अग्नि के हम लोग (स्वस्तये) सुख के लिये (अन्वारभामहे) यान बना के उनमें प्राणियों को स्थिर करें, (सः) वह आपके लिये (इन्द्र इव) बिजुली के तुल्य (भव) होवे।
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