मैं (आदित्येभ्यः) तेजस्वी (राजभ्यः) राजाओं से जिन (इमाः) इन सत्य (गिरः) वाणियों को (जुह्वा) ग्रहण के साधन से (सनात्) नित्य (जुहोमि) ग्रहण स्वीकार करता हूँ, उन (घृतस्नूः) जल के तुल्य अच्छे व्यवहार को शोधनेवाली (नः) हम लोगों की वाणियों को (मित्रः) मित्र (अर्य्यमा) न्यायकारी (भगः) ऐश्वर्यवान् (तुविजातः) बहुतों में प्रसिद्ध (दक्षः) चतुर (अंशः) विभागकर्त्ता और (वरुणः) श्रेष्ठ पुरुष (शृणोतु) सुने ।
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