जो (दाक्षायणाः) चतुराई और विज्ञान से युक्त (सुमनस्यमानाः) सुन्दर विचार करते हुए सज्जन लोग (शतानीकाय) सैकड़ों सेनावाले (मे) मेरे लिये (यत्) जिस (हिरण्यम्) सत्याऽसत्यप्रकाशक विज्ञान का (आ, अबध्नन्) निबन्धन करें (तत्) उसको मैं (शतशारदाय) सौ वर्ष तक जीवन के लिये (आ, बध्नामि) नियत करता हूँ। हे विद्वान् लोगो ! (यथा) जैसे मैं (युष्मान्) तुम लोगों को प्राप्त होके (जरदष्टिः) पूर्ण अवस्था को व्याप्त होनेवाला (असम्) होऊँ, वैसे तुम लोग मेरे प्रति उपदेश करो।
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