हे मनुष्यो ! (येन) जिस (अमृतेन) नाशरहित परमात्मा के साथ युक्त होनेवाले मन से (भूतम्) व्यतीत हुआ (भुवनम्) वर्त्तमान काल सम्बन्धी और (भविष्यत्) होनेवाला (सर्वम्, इदम्) यह सब त्रिकालस्थ वस्तुमात्र (परिगृहीतम्) सब ओर से गृहीत होता अर्थात् जाना जाता है, (येन) जिससे (सप्तहोता) सात मनुष्य होता वा पाँच प्राण, छठा जीवात्मा और अव्यक्त सातवाँ ये सात लेने-देनेवाले जिसमें हों, वह (यज्ञः) अग्निष्टोमादि वा विज्ञानरूप व्यवहार (तायते) विस्तृत किया जाता है, (तत्) वह (मे) मेरा (मनः) योगयुक्त चित (शिवसङ्कल्पम्) मोक्षरूप सङ्कल्पवाला (अस्तु) होवे ।
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