ये ते॒ पन्थाः॑ सवितः पू॒र्व्यासो॑ऽरे॒णवः॒ सुकृ॑ताऽअ॒न्तरि॑क्षे। तेभि॑र्नोऽअ॒द्य प॒थिभिः॑ सु॒गेभी॒ रक्षा॑ च नो॒ऽअधि॑ च ब्रूहि देव ॥
हे (सवितः) सूर्य के तुल्य ऐश्वर्य देनेवाले (देव) विद्या और सुख के दाता आप्त विद्वान् पुरुष ! जिस (ते) आपके जैसे सूर्य के (अन्तरिक्षे) आकाश में गमन के शुद्ध मार्ग हैं, वैसे (ये) जो (पूर्व्यासः) पूर्वज आप्तजनों ने सेवन किये (अरेणवः) धूलि आदि रहित (सुकृताः) सुन्दर सिद्ध किये (पन्था) मार्ग हैं, (तेभिः) उन (सुगेभिः) सुखपूर्वक जिनमें चलें ऐसे (पथिभिः) मार्गों से (अद्य) आज (नः) हम लोगों को चलाइये, इन मार्गों से चलते हुए हमारी (रक्ष) रक्षा (च) भी कीजिये (च) तथा (नः) हमको (अधि, ब्रूहि) अधिकतर उपदेश कीजिये, इसी प्रकार सबको चेतन कीजिये।
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