हे मनुष्यो ! जो (हिरण्यहस्तः) हाथों के तुल्य प्रकाशोंवाला (सुनीथः) सुन्दर प्रकार प्राप्ति कराने (असुरः) जलादि को फेंकनेवाला (सुमृडीकः) सुन्दर सुखकारी (स्ववान्) अपने प्रकाशादि गुणों से युक्त (देवः) प्रकाशक सूर्य्यलोक (यातुधानान्) अन्याय से दूसरों के पदार्थों को धारण करनेवाले (रक्षसः) डाकू, चोर आदि को (अपसेधन्) निवृत्त करता अर्थात् डाकू, चोर आदि सूर्योदय होने पर अपना काम नहीं बना सकते, किन्तु प्रायः रात्रि को ही अपना काम बनाते हैं ओर (प्रतिदोषम्) मनुष्यों के प्रति जो दोष उसको (गृणानः) प्रकट करता हुआ (अस्थात्) उदित होता है, वह (अर्वाङ्) समीपवर्ती पदार्थों को प्राप्त होनेवाला हमारे सुख के अर्थ (यातु) प्राप्त होवे, वैसे तुम होओ।
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