हे (सोम) उत्तम सोमवल्ली ओषधियों के तुल्य रोगनाशक राजन् ! (त्वम्) आप (इमाः) इन (विश्वाः) बहुत ) सब (ओषधीः) सोम आदि ओषधियों को (त्वम्) आप सूर्य्य के तुल्य (अपः) जलों वा कर्म को और (त्वम्) आप (गाः) पृथिवी वा गौओं को (अजनयः) उत्पन्न वा प्रकट कीजिये। (त्वम्) आप सूर्य्य के समान (उरु(अन्तरिक्षम्) अवकाश को (आ, ततन्थ) विस्तृत करते तथा (त्वम्) आप सूर्य्य जैसे (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमः) अन्धकार को दबाता। वैसे न्याय से अन्याय को (वि, ववर्थ) आच्छादित वा निवृत्त कीजिये, सो आप हमको माननीय ।
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