हे (हरिवः) प्रशस्त घोड़ोंवाले राजन् ! जैसे (समिधाने) प्रदीप्त किये हुए (अग्नौ) अग्नि में (इमा) ये (सवना) प्रातःसवनादि यज्ञकर्म (कृता) किये जाते हैं, (तु) इसी हेतु से (ग्रावाणः) गर्जना करनेवाले मेघ (युक्ताः) इकट्ठे होके आते हैं, वैसे (स्थिराय) दृढ़ (वृष्णे) सुखदायी विद्यादि पदार्थ के लिये (हरिभ्याम्) धारण और आकर्षण के वेगरूप गुणों से युक्त घोड़ों वा जल और अग्नि से (आ, प्र, याहि) अच्छे प्रकार आइये। इस प्रकार करने से (परमा) दूरस्थ (चित्) भी (रजांसि) स्थान (ते) आपके (दूरे) दूर (न) नहीं होते हैं।
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