परि॑ ते दू॒डभो॒ रथो॒ऽस्माँ२ऽअ॑श्नोतु वि॒श्वतः॑। येन॒ रक्ष॑सि दा॒शुषः॑ ॥
हे जगदीश्वर ! आप (येन) जिस ज्ञान से (दाशुषः) विद्यादि दान करनेवाले विद्वानों को (विश्वतः) सब ओर से (रक्षसि) रक्षा करते और जो (ते) आपका (दूडभः) दुःख से भी नहीं नष्ट होने योग्य (रथः) सब को जानने योग्य विज्ञान सब ओर से रक्षा करने के लिये है, वह (अस्मान्) आपकी आज्ञा के सेवन करनेवाले हम लोगों को (परि) सब प्रकार (अश्नोतु) प्राप्त हो
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